अगर देखनी है

अगर देखनी है कयामत तो चले आओ हमारी महफिल मे सुना है आज की महफिल मे वो बेनकाब आ रहे हैँ|

उसे मिल गए

उसे मिल गए उसकी बराबरी के लोग मेरी गरीबी मेरी मोहब्बत की कातिल निकली |

तुम हो मुस्कान

तुम हो मुस्कान लबों की…. बाकी ज़िन्दगी खाली-ख़ाली…!!

न कोई फिकर

न कोई फिकर, न कोई चाह हम तो बड़े बेपरवाह है उम्र फकीराना गुजरी है हम तो ऐसे शहंसाह है|

अपनी चाहत के

अपनी चाहत के नाम कर लेना, कोई उँचा मकाम कर लेना, अगर किसी मोड़ पर मिलो मुझसे, एक प्यारा सलाम कर लेना…

कैसे कह दूं

कैसे कह दूं, कि थक गया हूं मैं….. जाने किस-किस का, हौसला हूं मै|

खुद पुकारेगी मंजिल तो

खुद पुकारेगी मंजिल तो ठहर जाऊंगा….!! वरना मुसाफिर खुद्दार हूं यूँ ही गुजर जाऊंगा….!!

वापस आ रही है

वापस आ रही है, फिर वही सर्दियों की उदास शामें….. फिर तुम बेसबब ,बेहद याद आओेगे…!!

तुमने तो ठुकरा दिया

तुमने तो ठुकरा दिया हाल-ए-गरीबी देखकर पर हम तो आज भी अनमोल हैं वफ़ा के बाजार में..!!!

वक्त भी कैसी

वक्त भी कैसी पहेली दे गया…उलझने सौ…जान अकेली दे गया…